Transcript:

(00:00) आप लोग एक दावा करते हैं कि कुरान में कोई भी चेंजेज नहीं आए हैं सिंस इट वास ओरिजनेटेड राइट फिथ सेंचुरी या सिक्स सेंचुरी में आईम नॉट वेरी शर की कौन सी डेट हम ओरिजिनेशन क्ल नहीं बोलते हैं रिवील्ड क्लब्स बोलते हैं जी ठीक है सर माफी चाहता हूं रिवील्ड न सिस इट वास रिवील्ड उसमें चेंजेज नहीं हुआ राइट तो मेरे हिसाब से अगर कोई यह दावा करता है कि इस किताब में हजार साल में कोई चेंज नहीं आया तो उसका सबसे बड़ा एविडेंस य होगा कि आप मुझे मेरे सामने ओरिजिनल कॉपी रख दीजिए और आज की कॉपी रख दीजिए मैं कंपेयर कर लूंगा देख लूंगा कि भाई इसमें क इसमें कोई

(00:38) चेंज नहीं हुया तो आपके पास ओरिजिनल कॉपी है कुरान की फ सेंचुरी की मैं दूसरे सवाल की तरफ आ जाता हूं तो एक आप लोग एक दावा करते हैं कि कुरान में कोई भी चेंजेज नहीं आए हैं सिंस इट वास ओरिजनेटेड राइट सेंचुरी या सिक्स सेंचुरी में आईम नॉट वेरी शर की कौन सी डेट हैने बोते रिवील्ड क लब्स बोलते हैं जी ठीक है सर माफी चाहता हूं रिवील्ड न सिंस इट वास रिवील्ड उसमें चेंजेज नहीं हुआ राइट तो मेरे हिसाब से अगर कोई यह दावा करता है कि इस किताब में हजार साल में कोई चेंज नहीं आया तो उसका सबसे बड़ा एविडेंस ये होगा कि आप मुझे मेरे सामने ओरिजिनल कॉपी रख दीजिए

(01:19) और आज की कॉपी रख दीजिए मैं कंपेयर कर लूंगा देख लूंगा कि भाई इसमें कप इसमें कोई चेंज नहीं हुया तो आपके पास ओरिजिनल कॉपी है कुरान की फिथ सेंचुरी की ठीक करती है सही है इसका जवाब यह है के एक तो ये कि फिफ्थ सेंचुरी में कुरान मुकम्मल नाजिल नहीं हुआ है यानी रसूल अकरम सल्लल्लाहु अल वसल्लम की जो वफात है वह 630 30 है ना 62 62 632 में आप सला वसल्लम की वफात हुई है 13 23 साल की के अरसे में कुरान करीम नाजिल हुआ है और उसके के बाद फिर तकरीबन समझ लीजिए कि दो साल आप की वफात के फौरन बाद 33 34 में कुरान करीम को एक जगह जमा कर दिया गया लिखा तो पहले ही गया था जमा

(02:12) कर दिया गया यह मुख्तसर सी हिस्ट्री है अब मैं आपसे यह पूछता हूं कि य जो आपने उसूल निकाला है कि मैं चेंज जब मानूंगा जब आप ओरिजिनल कॉपी और आज की कॉपी सामने रख देंगे तब मैं मानूंगा कि चेंज नहीं हुआ ठीक है अच्छा ये उसूल आपने कहां से लिया है इस उसूल पर बात करेंगे ये बेसिक है ना आपने कहा चेंज नहीं हुआ है तो मुझे ओरिजिनल कॉपी देखनी पड़ेगी ये देखनी पड़ेगी ठीक है यही तो मैं कह रहा हूं ये बेसिक उसूल नहीं है बेसिक उसूल ये उस वक्त है कि अगर आपके सामने ओरिजिनल कॉपी हो किसी भी मैनु स्क्रिप्ट की को ओरिजिनल मैनु स्क्रिप्ट हो और उसके बाद प्रिंटेड

(02:50) वर्जन हो और आप उससे चेंज साबित कर दें ये कहे कि ये रहा चेंज अब यह उसूल सही होगा लेकिन चेंज ना होने का ये उसूल नहीं है यह चेंज होने का उसूल है ट्स द पॉइंट य नी टू अंडरस्टैंड ठीक है लेकिन ओरिजनल कॉपी देख चेंज ना होने का दावा हमारा है आप उस पर यह दलील पूछ सकते किई ओरिजिनल कॉपी और जो मौजूदा कॉपी है व दोनों कंपेयर करके दिखाओ नहीं अगर आप यह कहेंगे कि चेंज हुआ है तो अब हम आपसे पूछेंगे कि तुम ओरिजिनल कॉपी और आज की कॉपी में दिखाओ कंपेयर करके और बताओ किधर चेंज हुआ है ी तो कमाल है हमारा ये दावा ही नहीं है भाई जो दावा आपका है उसके ऊपर पहले एजामिन

(03:35) होगा ना जी बिल्कुल और दूसरा ये है भाई कोय समझना है एक मिनट सॉरी एक मिनट भाई आपने एक चीज समझनी है नॉन मूमिन भाई आपने दो तीन सवाल जो स्टार्ट में भी किया बेसिकली स्ट्र मैनिंग कर रहे हैं जो मुस्लिम उम्मा का क्लेम अपने सेहत के बारे में हा अपनी वेरिफिकेशन के बारे में उसूल जिसको कहते हैं इंटरनल क्रिटिसिजम जो कि बेसिक उसूल वो है ही नहीं है जो पैरामीटर्स ही नहीं है आप उसके ऊपर परख रहे हैं मिसाल के तौर पर कुरान की कंपाइलेशन में हम मेमोराइज करने को बेसिक चीज समझता है हिज करना हमारे नजदीक वो चीज है आप दुनिया के किसी भी आफिस को बिठा ले

(04:13) तो अगर हम बुक के ऊपर इस तरह तो आप दुनिया के बहुत से शास्त्र हैं बहुत चीजें जैसे वेद है मनुस्मृति है उसके ऊपर रिसर्च हो रही है पता चल रहा है साबत कोई नहीं होता वेद का ओल्डेस्ट जो है ना वो चक्कर इसलिए तो आप एनोट हो गए हैं आपको मुबारक हो इंशाल्लाह इस्लाम को पढ़ेंगे तो आप वापस आ जाएंगे इंशाल्लाह घर वापस हो जाएगी मकसद कहने का ये है कि जो उसूल हम पेश करते हैं या जो हमने इंटरनल क्रिटिसिजम के लिए वेरिफिकेशन का पेश किया हुआ है उसके मुताबिक अगर आप जज करना चाहते हैं तो ठीक है अदर वाइज एक ऑप्शन रहेगी आप अपनी मर्जी के मुताबिक साबित करना चाहते हैं तो पहले

(04:45) आपको अपने फंडामेंटल्स को सिद्ध करना होगा कि आप जो उसूल पेश कर रहे हैं क्या वही मेयार दुनिया में चलता है जैसे हजरत ने रखा ये है मुकम्मल प्रोसीजर ये तो बेसिक उसूल है ना अच्छा अब आपने ये जो सवाल लिया है ये जो आपने सवाल उठाया है ये उठाया है आपने सच वाले से वही सचवा मैं सुनता ही नहीं मैंने आज तक भी नहीं सुना मुफती साब मैं इनसे पूछना चाहता हूं कि नॉन मोमिन भाई आपके नजदीक किसी भी टेक्स्ट को टेक्स्ट का मतलब मत टेक्स्ट को प्रिजर्व करने के क्याक तरीके हैं प्रिजर्व करने के तरीके तो कुछ भी हो सकते हैं टेक्स्ट का मतलब य समझ रहे हैं

(05:22) टेक्स्ट का मतलब मैं जो वर्ड यूज किया टेक्स्ट इसका मतलब समझ रहे हैं आप टेक्स्ट म इसका मतलब वो चीज नहीं होती जो जो लिखी हुई हो टेक्स्ट का मतलब होता है कि कोई भी हां मथन तो कोई भी जो टेक्स्ट है उसको प्रिजर्व करने के कितने तरीके हैं पता है आपको अब ये तो मुझे नहीं पता कितने तरीके हैं आप बताइ देख आपको पता नहीं और सिर्फ एक तरीका लेकर आ गए आप तरी तरीका यहां प क्या मैटर करता है आपने कहा अरे भाई इ डज ये मैटर करता है जब आपने सुनिए सुन लीजिए सुन लीजिए आप अगर आप अगर तरीके नहीं जानते मान लीजिए 10 तरीके 10 नहीं जानते एक तरीका आपको पता है और आप

(05:59) उसको लेकर आ ग इस तरीके से साबित करो वो न तरीको से भी साबित हो सकता है ना अगर 10 तरीके उसके आप बताए आपका कौन सा तरीका आपका कौन सा पैरामीटर है कि आप बोल रहे कि ये चेंज नहीं हुआ आपका कौन सा पैरामीटर है तो अभी आमिर भाई ने कहान मोमन भाई के एक तरीका तो यह है कि आप लिख के किसी चीज को प्रव करते हैं जो कि इट हिस्ट्री के अंदर ट वास नॉट द गुड मेथड टू राइट डाउन समथिंग टू प्रिजर्व क्योंकि उसम बहुत सारी दिक्कत आएंगी डिटेल में मैं अभी नहीं जा सकता तो एंट टाइम्स के लिए और मिडिवल टाइम्स के भी एक बड़े पीरियड के लिए सबसे बेहतर तरीका चीजों को प्रिजर्व करने का यह

(06:37) था कि उसको मासेज जो है ना याद करें उसको एक दो इंडिविजुअल नहीं मासेज जो है उसको याद करें वो सबसे बेहतर तरीका है किसी भी चीज को प्रिजर्व करने का असम भाई इनकी जुबान में श्रुति जैसे श्रुति है ना श्रुति वेदास को आप श्रुति मानते हैं तो श्रुति किसे कहते आमर भाई मसला ये है कि मैं ये वर्ड इसलिए यूज नहीं कर रहा हूं कि वेदा में जो है वो सिर्फ सिंगल पर्सन या मासे के अंदर जो है वो मेमोराइजेशन नहीं हैट इ प्रॉब्लम जबरदस्त जबरदस्त मैंने इनको नहीं बिल्कुल आपने ठीक बड़ा इंपोर्टेंट पॉइंट है मेरे ख्याल से ये टेक्निकल बस के अंदर जो आसिम भाई ने रखाv (07:12) है मैंने सिर्फ य याद रखें क्योंकि ये वर्ड आसिम भाई ने जो पकड़ा है वो बड़ा जबरदस्त पकड़ा है मैं सिर्फ इनको समझाने के लिए कह रहा हूं कि जैसे श्रुती के बारे में यह क्लेम किया जाता है मगर आसिम भाई ने जो बात की मैसेस को प्रिजर्व करने के लिए यस मैसेज चाहिए होते है जी अपना नॉन ममन भाई ठीक है क् हो क्लियर हो गया हां ये क्लियर हो गया जी

Quran ki original copy kaha hai? Ye sawaal aksar un logon ki taraf se uthta hai jo Qur’an ke tahaffuz (preservation) par shak karte hain. Unka kehna hota hai ke agar aap kehte hain ke Qur’an me kabhi koi tabdili nahi hui, to aap ke paas asal copy honi chahiye – yani wahi manuscript jo 5th ya 6th century me thi.

Ye objection pehli nazar me logical lag sakta hai, lekin jab hum iski tehqiqat karte hain to pata chalta hai ke isme kaafi logical ghaltiyan hain.

Is article me hum:


Key Takeaways:


Objection: Kya Qur’an ke tahaffuz ka saboot asal 5th century copy hai?

Objection raise karne wale ne kaha:

“Agar Qur’an me kabhi tabdili nahi hui to original copy la kar dikhao jo 5th century ki ho, aur aaj ki copy se compare karo.”

Ye ek superficially reasonable demand lagti hai, lekin iske peechhe jo assumptions hain wo galat hain. Pehle is objection ki buniyadi ghalti ko samjhte hain.


Logical Fallacy: Flawed Criterion (False Premise)

Ye objection ek False Criterion Fallacy ka shikar hai.

Yani:

Example:
Kya Shakespeare ke asli handwritten plays aaj maujood hain? Nahi. Magar hum phir bhi unke content ko authentic mante hain – kyun? Kyunke reliable chain of transmission, multiple copies aur unki mutual consistency se unka tahaffuz sabit hota hai.


Quran Ka Preservation: Sirf Likha Hua Nahi, Zuban Se Yaad Rakha Gaya

Islam me Qur’an ka tahaffuz sirf likhne par nahi chhoda gaya. Islam ka nizaam hifz par mabni hai. Mufti Yasir ne wazeh kiya:

“Qur’an ko likhne ke sath sath usay mass memorization ke zariye bhi protect kiya gaya.”

Yani Qur’an ka tahaffuz ek zinda process tha – sirf dead documents par depend nahi karta.


Aitraaz ka Palatna: Jab Tum Change ka Claim Karo, To Tum Saboot Do

Yeh baat Mufti Yasir ne bohot powerful tareeqe se highlight ki:

“Ham claim kar rahe hain ke Qur’an unchanged hai. Tum keh rahe ho ke change hua hai – to tumhe prove karna padega ke kaha change hua.”

Yani:


Internal vs External Verification

Islam me Qur’an ka tahaffuz internal verification ke zariye hota hai – yani:

Jab ke objector ka tareeqa tha external verification – sirf document dekh kar.

Ye dono tareeqay mukhtalif hain, aur Mufti Yasir ne ye wazeh kiya ke Islam ka system zyada logical aur reliable hai, especially jab writing ka system unreliable tha.


Manuscripts Ka Tazkirah

Aksar log samajhte hain ke Qur’an ki old manuscripts nahi milti. Ye ghalat hai.


Western Historians bhi Qur’an ke tahaffuz ko mante hain

Modern academic research bhi maanti hai ke Qur’an ka text remarkably stable raha hai.

Example:

Yani outsiders bhi Qur’an ke preservation ko maante hain – magar log phir bhi emotional objections uthate hain bina solid research ke.


Conclusion

Jo objection uthaya gaya tha – ke asli 5th century Qur’an copy nahi hai to Qur’an change ho gaya – wo na sirf logic me flawed hai, balki uska tareeqa bhi academic standard se neeche hai.

Qur’an ka tahaffuz duniya ki kisi bhi kitaab se zyada logical, robust aur proven hai:

Aakhir me, ye baat sabit hoti hai ke Qur’an na sirf Allah ki kitaab hai, balki sab se zyada protected kitaab bhi hai.


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